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आकुल मन तू क्यों घबराया

यूँ तो मैं सभी को अपने अनुभवों के आधार पर परामर्श दिया करता था, किन्तु एक समय की घटना है, कि मुझे मेरे परामर्श के कारण ही कई विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उस वक्त मेरी वेदना उस पराकाष्ठा को पार कर चुकी थी, कि मैं कुछ करने की स्थिति में नहीं था। मैंने अपनी वेदना को शब्दों में पिरोने की सोची, जिसका परिणाम यह कविता है, जो मेरे ह्रदय के बहुत समीप है। कविता पढ़े, तथा उस अनुभूति को महसूस करने की कोशिश करें, अवश्य हीं आप भी उस वेदना को महसूस कर सकेंगे। ⊱✿ ✣ ✿⊰ आकुल मन तू क्यों घबराया? यह विस्मय की घड़ी गज़ब है, बस कहने को अपने सब हैं; फूट पड़े स्वर निस्वार्थ भाव से, ठोकर खाने पर पछताया, आकुल मन तू क्यों घबराया? पहले स्वयं की निधि बढ़ाना, तब गैरों पर रहम दिखाना; सोचो, छाया दरख़्त की, कभी उसी के काम न आया, आकुल मन तू क्यों घबराया? मन का तार मन हीं में तोड़ो, जिह्वा-शूल की दिशा मरोड़ो, नव-कल्प की भेद को समझो, व्यथा अपनी है, प्रेम पराया; आकुल मन तू क्यों घबराया? ⊱✿ ✣ ✿⊰ धन्यवाद दोस्तों।

मुस्काना

ना जाने क्यों, बेवज़ह लोग मुस्काना छोड़ देते हैं। हज़ारों लाखों की संख्या में प्रकृति ने हम सभी को गिरने, हारने, ठोकर खाने इत्यादि के पश्चात् मुस्कुराने के उदाहरण दिए हैं, कि कैसे इतनी चोट के बावजूद ये सारी चीज़ें यूँ मधुर ध्वनि में मुस्कुराने का संदेश दे जाती हैं, फिर हम मानव, जिनमें सोचने-समझने, चिंतन करने, बोध इत्यादि की अद्वितीय तथा अद्भुत कला है, जो किसी अन्य प्रजाति में नहीं, इसके बावज़ूद हम हल्की फुल्की बातों तथा परेशानियों के कारण मुस्काना छोड़ देते हैं।         यह कविता मैंने इसी बात को ध्यान में रखते हुए लिखी, क्योंकि मुस्कान आपके चेहरे की रौनक हीं नहीं बढ़ाती, बल्कि ये आपको एक आत्मबल प्रदान करती है, जो आपको किसी भी परेशानी से जूझने की एक अद्भुत शक्ति प्रदान करती है। यह कविता पढ़े, तथा अपनी अधरों पर हमेशा मुस्कान बनाएं रखें। ⊱✿ ✣ ✿⊰ मुस्काना लहराती जब पवन चले, यूँ इधर-उधर पत्ते बिखरे; झंझावात की दौर चली, नभ से जल की बूंद गिरे; गिरने पर भी छम-छम करती, उनसे मैंने है यह जाना; कभी गिरो गर पथिक राह में, तुम भी ऐसे मुस्काना। भयप्रद अग्नि भय फैला...

कदम बढाओ, बढ़ चलो।

कभी कभी इंसान को न जाने क्या हो जाता है, कि वह अपने पथ से भ्रमित हो, या तो वापस लौटने लगता है, या अपना पथ ही बदल लेता है, जिसका प्रतिफल यही आता है..कि वह पराजित हो जाता है।           किन्तु, यदि वह उसी पथ पर निरंतर चलता रहे, बिना किसी संकोच के, तो यह पराजय उसका अंत नहीं। इसी से, डरो नहीं अपनी हार से। जितनी बार हारोगे, तुम हार के एक नए कारण को जान जाओगे, जो अगली बार में तुम्हे मज़बूती प्रदान करेगी।             यह कविता, मेरे ह्रदय के बहुत करीब है, क्योंकि यह हमेशा से मुझे पुनर्बलन देता आया है। पेश है आपके सामने यह कविता, जिसका शीर्षक है "बढ़ चलो" । उम्मीद है, आप सभी को भी यह कविता पसंद आएगी। ⊱✿ ✣ ✿⊰ तुम चमन की ओज हो, प्रभात सा निखर चलो..! चले चलो उधर सतत, चाहे तुम जिधर चलो..! काट डालो बेड़ियों को, अड़चनें बढ़ाए जो, रुको ना पंथ शूलों से, कदम बढ़ाओ बढ़ चलो..! तुम्हारा लक्ष्य ये नहीं, जहां पे तुम रुके खड़े, ना काल ना ये अंत है, जो तुम अडिग डरे खड़े..! संकल्प लो, प्रबल बनो, जिधर चलो, संवर चलो..! ...

हमें हिन्दुस्तानी हीं रहने दो

पेड़ नामी देश में हड़कंप मची है..  आखिर कैसे.. कैसे कोई रोक दे बढ़ना..? (नोट: कविता सबसे नीचे है.. चाहें तो व्यंग पढ़ कर कविता पढ़े, आनंद आएगा)👇👇👇 सारी पत्तियां शोर मचाना शुरू कर दीं, शाखाएं  भूख हड़ताल  करने लगीं, तनाएं  आत्मदाह  करने पर उतारू हो गईं.. कि आखिर ऐसा भेद-भाव क्यों..? दरअसल, बात ये हुई थी, कि अब तनाओं को खाना बनाना था, पत्तियों को तनाओं की जगह पेड़ को मजबूती से पकड़ना था..! आख़िर कोई क्या कहता..जब  जड़ों ने हीं आदेश पारित कर दिया  हो..! पेड़ नमक वह देश बेचारा लाचार पड़ा हुआ था..वो भी क्या करता, जब जड़ें हीं उसकी चिंता ना करें। उपरोक्त अनुच्छेद पढ़ने के पश्चात आप निम्नांकित कुछ प्रश्नों के उत्तर अपने मन में रखें, और तब लेख को पढ़े। क्या पेड़ नमक वह देश तरक्की कर पाएगा..जब ऐसी परिस्थितियां उसके सामने हो..? क्या जड़ों का यह फ़रमान किसी भी दृष्टि से उचित है..? मुझे पता है, आपका उत्तर ना हीं रहा होगा! और यह विडम्बना हीं है, कि आज़ादी के पश्चात हम और गुलाम बनते चले गए..!  ये जंजीरें आख़िर क्यों..? ये बंधने आख़...

बापू एक बार इस भारत में आ जाओ

हमारे देश भारत की यह विडम्बना हीं है, कि  सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले, एक दूसरे के प्रति सद्भावना के लिए हमेशा कहने वाले, महात्मा गांधी ने इस भारतभूमि पर जन्म लिया, जो पूरे विश्व की प्रेरणाश्रोत रहे, किन्तु हमारे हीं देश में आज उनके विचारों को दबा कर, हम एक नए भारत का निर्माण करने पर तुले हैं, जो छल कपट, द्वेष भावना, इत्यादि से भरा रहे; ऐसे समय में बापू के विचारों का फिर से भारत में आना बहुत ही आवश्यक जान पड़ता है, इसलिए, यह कविता बापू को फिर से एक बार भारत में बुलाने की एक चेष्टा है।                  यदि आपको यह कविता पसंद आए, तो अवश्य हीं शेयर करें। 👇👇👇👇👇कविता यहां है👇👇👇👇👇👇 ⊱✿ ✣ ✿⊰ बापू तेरे वचन आज भी, कानों में गुंजन करते हैं, प्रेम, सद्भावना, एकता सभी, दिल पर चढ़ते उतरते हैं..। जिस क्षण सत्य अपने मार्ग पर, एक कदम बढ़ाता है, प्रवंचना, झूठ, फरेब सब, ठोकर मार गिराता है..। बापू ऐसे कठिन समय में, कुछ तो राह दिखा जाओ, छोड़ो हठ को एक बार फिर, इस भारत में आ जाओ। देखो ना ये नए छोकड़े, कैसी...